हरतालिका तीज व्रत
भादवा शुक्ल तृतीया को महिलाए अखण्ड सौभाग्य के लिये तथा कन्याए अच्छे वर कि प्राप्ति कि कामना के लिये व्रत करती है |इस व्रत के करने से भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है | हरतालिक तीज के कथा सुनने व पढ़ने मात्र से भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है और सुख-शांति और समृद्धि में वृद्धि होती है।
पूजन सामग्री
केला, केला स्तम्भ, दूध, सुहाग पिटारी, गंगाजल, दही, तरकी, चूड़ी, चावल, घी, बिछिया, फूल, हार, शक्कर, कंघा, मृत्तिका, शहद, शीशा, चन्दन, कलश, नाड़ा, डोरा, केशर, दीपक, फल, पान, मिस्सी, धूप, कपूर, सुपारी, महावर की गोली, वस्त्र, सिंदुर, पकवान, यज्ञोपवीत, सुरमा, मिठाई।
हरतालिका तीज व्रत कथा
श्री परम पावन भूमि कैलाश पर्वत पर विशाल वट व्रक्ष के नीचे भगवान शिव-पार्वती सभी गणों सहित बाघम्बर पर विराजमान थे | बलवान वीरभद्र , भ्रंगी , श्रंगी , नंदी आदि अपने -अपने पहरों पर सदाशिव के दरबार कि शोभा बड़ा रहे थे | उसी सुअवसर पर महारानी पार्वती जी ने भगवान शिव से दोनों हाथ जोड़कर प्रश्न किया कि – “हे महेश्वर ! मेरे बड़े सौभाग्य है जो मैने आप सरीखे अर्धंगी पति को वरण किया | क्या में जान सकती हु कि मैने वह कोनसा पुन्य अर्जन किया है? आप अंतर्यामी है , मुझ दासी को वर्णन करके बताने कि क्रपा करे “| महारानी पार्वती जी कि एसी प्राथना सुनने पर शिवजी बोले -“प्रिय! तुमने अति उतम पुण्य किया था , जिसमे मुझे प्राप्त किता है | वह अति गुप्त व्रत है पर तुम पर प्रकट करता हु | वह यह है कि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष के तीज का व्रत हरतालिका व्रत के नाम से प्रसिद्ध है| यह व्रत जैसे तारागणों में चन्द्रमा, नवग्रहों में सूर्य, वर्णों में ब्राह्मण, देवताओं में गंगा, पुराणों में महाभारत, वेदों में सोम, इन्द्रियों में मन, ऐसा यह व्रत श्रेष्ठ है। जो तीज हस्त नक्षत्र युक्त पड़े वह और भी महान पुण्यदायक होती है।” ऐसा सुनकर पार्वती जी ने कहा- “हे महेश्वर ! मैंने कब और कैसे यह तीजा व्रत किया था, विस्तार के साथ श्रवण करने की इच्छा है।” इतना सुन भगवान शंकर बोले कि- “भाग्यवान उमा ! भारत वर्ष के उत्तर में हिमालय श्रेष्ठ पर्वत है। उसके राजा का नाम हिमांचल है। वहाँ तुम भाग्यवती रानी मैना से पैदा हुई थीं। तुमने बाल्यकाल से ही मेरी आराधना करना आरम्भ कर दिया था। कुछ उम्र बढ़ने पर तुमने हिमालय की दुर्गम गुफाओं में जाकर सहेली सहित मुझे पाने हेतु तप आरम्भ किया।
तुमने ग्रीष्म ऋतु में बाहर चट्टानों पर शासन लगाकर तप किया, वर्षा ऋतु में बाहर पानी में तप किया, हिम ऋतु में पानी में खड़े होकर भरे ध्यान में संलग्न रहीं। इस प्रकार 6 ऋतुओं में तपस्या करने पर भी जब मेरे दर्शन न मिले तब तुमने ऊर्ध्वमुख होकर केवल वायु सेवन किया। फिर वृक्षों के सूखे पत्ते खाकर इस शरीर को क्षीण किया। ऐसी तपस्या में लीन देखकर महाराज हिमांचल को अति चिंता हुई और तुम्हारे विवाह हेतु चिंता करने लगे। इसी सुअवसर पर महर्षि देवऋषि नारदजी उपस्थित होते भये। राजा ने अति हर्ष के साथ नारदजी का स्वागत पूजन किया और उपस्थित होने का कारण जानने के इच्छुक होते भये। नारदजी ने कहा- “राजन! मुझे भगवान विष्णु ने भेजा है। मैं चाहता हूँ कि आपकी सुन्दर कन्या को योग्य वर प्राप्त हो। सो बैकुण्ठ निवासी शेषशायी भगवान ने आपकी कन्या का वरण स्वीकार किया है। क्या आपको स्वीकार है ?” राजा हिमांचल ने कहा- “महाराज! मेरा सौभाग्य है जो मेरी कन्पा को विष्णुजी ने स्वीकार किया और मैं अवश्य ही उन्हें अपनी कन्या उमा का कन्यादान करूँगा।” यह सुनिश्चित हो जाने पर नारदजी ने बैकुण्ठ पहुँचकर श्री विष्णु भगवान से पार्वतीजी के विवाह का पूर्ण होना सुनाया। इधर महाराज हिमांचल ने वन में पहुँचकर पार्वती जी को भगवान विष्णु के साथ विवाह होने का निश्चय हो चुका सुनाया। ऐसा सुनते ही पार्वतीजी को महान दुःख हुआ। उस दुःख से तुम विह्वल होकर अपनी सखी के पास पहुँचकर विलाप करने लगीं। तुम्हारा विलाप देख सखी ने तुम्हारी इच्छा जानकर कहा – “देवी! मैं तुम्हें ऐसी गुफा में तपस्या के लिए ले चलूँगी जहाँ महाराज हिमांचल तुम्हें ढूँढ भी न सकेंगे।” ऐसा कह सहेली उमा सहित हिमालय की गहन गुफा में विलीन हो गई। तब महाराज हिमांचल घबराकर पार्वतीजी को ढूँढते हुए विलाप करने लगे कि- “मैंने विष्णुजी को जो वचन दिया है वह कैसे पूर्ण होगा ?” ऐसा कह वह मूर्छित हो गए। तब सभी पुरवासियों को साथ लेकर ढूँढने को महाराज ने पदार्पण कर ऐसी चिन्ता करके कि-“क्या मेरी कन्या को कोई व्याघ्र खा गया, या सर्प ने डस लिया, या कोई राक्षस हर कर ले गया।” उस समय तुम अपनी सहेली के साथ ही गहन गुफा में पहुँच बिना जल अन्न के मेरे व्रत को आरम्भ करके नदी की बालू का लिंग स्थापित कर विविध वन पुष्प-फलों से पूजन करने लगीं। उसी दिन भाद्र मास की तृतीयाशुक्ल पक्ष हस्त नक्षत्र युक्त प्राप्त थी। मेरी पूजा के फलस्वरूप से मेरा सिंहासन हिल उठा तो मैंने तुम्हें दर्शन दिया और तुमसे कहा – “देवी मैं तुम्हारे व्रत और पूजन से अति प्रसन्न हूँ। तुम अपनी कामना का मुझसे वर्णन करो।” इतना सुन तुमने लज्जित भाव से प्रार्थना की- “आप अन्तर्यामी हैं। मेरे मन के भाव आप से छुपे नहीं हैं। आपको पति रूप में चाहती हूँ।” इतना सुनकर मैं तुम्हें एवमस्तु, इच्छित पूर्ण वरदान देकर अन्तर्ध्यान हो गया। इसके बाद तुम्हारे पिता हिमांचल मन्त्रियों सहित ढूँढते-ढूँढते नदी तट पर मारे शोक के मूर्छित होकर गिर पड़े। उसी समय तुम अपनी सहेली के साथ मेरी बालू की मूर्ति विसर्जन करने हेतु नदी तट पर पहुँचीं। उसी समय तुम्हारे नगर निवासी, मन्त्रीगण सहित हिमांचल तुम्हारे दर्शन कर अति प्रसन्नता को प्राप्त हुए और लिपट-लिपटकर रोने लगे और बोले- “उमा ! तुम इस भयंकर वन में कैसे चली आईं ? जो अति भयानक हैं, जहाँ सिंह, व्याघ्घ्र, ज़हरीले भयंकर सर्पों का निवास है, जहाँ मनुष्य के प्राण संकट में पड़ सकते हैं। इससे हे पुत्री! इस भयंकर वन को त्यागकर अपने गृह को प्रस्थान करो।” पिता के ऐसा कहने पर तुमने कहा- “पिताजी ! मेरा विवाह तुमने भगवान विष्णु के साथ स्वीकार कर लिया है। इसलिए मैं इसी वन में रहकर अपने प्राण विर्सजन करूँगी।” ऐसा सुनकर महाराज हिमांचल अति दुःखी हुए और बोले-“प्यारी पुत्री ! तुम शोक मत करो मैं तुम्हारा विवाह कदापि भगवान विष्णु के साथ नहीं करूँगा और तुम्हारा अभिष्ट वर जो तुम्हें प्राप्त है उन्हीं सदाशिव के साथ तुम्हारा विवाह करूँगा। पुत्री तुम मेरे पर अति प्रसन्न हो।” तब सहेली के साथ नगर में उपस्थित होकर अपनी माता, सहेलियों से मिलती भईं। कुछ समय बाद शुभ मुहूर्त में तुम्हारा विवाह वेद-विधि के साथ महाराज हिमांचल व महारानी मैना ने मेरे साथ कर पुण्य अर्जन किया। हे सौभाग्यशालिनी जिस सहेली ने तुमको हरण कर हिमालय की गुफा में रख मेरा तीज व्रत किया इसी से इस व्रत का नाम “हरतालिका” पड़ा और यह व्रत सब व्रतों का व्रतराज हुआ।” इस पर माता पार्वती ने कहा -“प्रभु! आपने मेरे मिलने की सुखद कथा सुनाकर मुझे प्रसन्न तो किया पर इस व्रत के करने का विधान व फल मुझे नहीं सुनाया। इसलिए कृपा करके मुझे इसके करने की विधि व पृथक-पृथक फल भी सुनाइए। इतना सुनके भगवान शिव ने कहा- “प्रिये! मैं इस व्रतराज का सविधान फल सुना रहा हूँ। यह व्रत सौभाग्यवती नारी व पति चाहने वाली कन्याओं को करना चाहिए। यह व्रत भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की द्वितीया के शाम को आरम्भ कर तीज का व्रत धारण करें। यह व्रत निराहार बिना फल-आहार और निर्जला रहकर करना चाहिए। भगवान शिव-पार्वती की प्रतिमा सुवर्ण की स्थापित करके केले, पुष्प आदि के खम्भे स्थापित करके रेशमी वस्त्र के चंदोवा तानकर बंदनवार लगा शिव का बालू का लिंग स्थापित करके पूजन वैदिक मंत्र स्तुति-गान वाद्य, भेरी शंख, मृदंग झांझर आदि से रात्रि जागरण करना चाहिए और भगवान शिव का पूजन करने के बाद फल, फूल, पकवान, लड्डू, मेवा, मिष्ठान तरह-तरह के भोग की सामग्री समर्पण कर फिर ब्राह्मण को द्रव्य, अन्न, वस्त्र, पात्र आदि का दान श्रद्धा युक्त देना चाहिए। भगवान शिव को प्रति वस्तु को सिद्ध पंचाक्षरी मन्त्र से (ॐ नमः शिवाय) कहकर समर्पित करना चाहिए। प्रार्थना करते समय अपनी कामना इच्छा को भगवान के सामने प्रेषित करें। फिर पार्वतीजी से आगे लिखी प्रार्थना करें: –
प्रार्थना पद
जय जग माता, जय जग माता, मेरी भाग्य विधाता॥ टेक ॥
तुम हो पार्वती शिव प्यारी, तुम दाता नन्द पुरारी।
सती संतों में रेख तुम्हारी, जय हो आनन्द दाता, जय जग ॥ १ ॥
इच्छित वर मैं तुमसे पावो, भूल चूक को दुःख न उठाऊँ।
भाव-भक्ति को तुमसे पावो, कर दो पूरन दाता, जय जग॥ २॥
प्रार्थना के बाद पुष्पों को दोनों हाथों में लेकर पुष्पांजलि समर्पण करें, फिर चतुर्थी को शिवलिंग को किसी नदी या तालाब में विसर्जन करें, फिर तीन ब्राह्मणों को भोजन कराके दक्षिणा दें। इस प्रकार यह व्रत पूर्ण करने से नारी सौभाग्यवती होती है और धन व पुत्र पौत्रों से सुखी जीवन व्यतीत करती है। कन्याओं को व्रत करने से कुलीन, विद्वान, धनवान वर प्राप्त होने का सौभाग्य प्राप्त होता है। हे देवी! जो सौभाग्यवती नारी इस व्रत को नहीं धारण करती वह बार-बार वैधव्य व पुत्र शोक को प्राप्त होती है। जो नारी तृतीया के दिन व्रत रखकर चोरी से अन्न खाती है वह शूकरी का जन्म पाती है, जो फल खाती है वह बंदरिया की योनि प्राप्त करती है, जो जल पीती है वह जोंक का जन्म लेती है, जो दूध पीती है वह सर्पिणी का जन्म ग्रहण करती है, जो नारी माँस खाती है वह बाघिनी होती है, जो दही खाती है वह बिल्ली का जन्म पाती है, जो मिठाई खाती है वह चींटी के जन्म को धारण करती है, जो सब चीजें खाती है मक्खी का जन्म लेती है, जो उस दिन सोती है वह अजगरी योनि को प्राप्त करती है। हे उमा ! जो इस व्रत को श्रद्धा विधि से धारण करती है वह मुझसा पति प्राप्त करती है व दूसरे जन्म में तुम्हारे समान स्वरूपवान हो करके इस संसार में उत्तम उत्तम सुख भोग को प्राप्त होती है। इस व्रत के करने के बाद नारियाँ शिव लोकवासी होती हैं।
इति श्री हरतालिका व्रत कथा समाप्त


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